आंखें शरीर का सबसे संवेदनशील अंग हैं, इसलिए उनमें होने वाली थोड़ी सी भी समस्या तुरंत परेशान करती एवं दिखाई देने लगती है। आँख आना, जिसे पिंक आई और डॉक्टरी भाषा में कंजेक्टिवाइटिस कहते हैं, आँखों की सबसे आम समस्या है। यह समस्या बच्चों और वयस्कों सबको प्रभावित कर सकती है। यह आमतौर पर एक आँख से शुरू होती है और कुछ दिन में दूसरी आँख में फ़ैल जाती है, और इसके कई मामलों में दो हफ़्तों में यह अपनेआप ठीक हो जाती है। यह परिवार के सभी सदस्यों में फ़ैल सकता है ।
हमारी आंखों के सफेद हिस्से और पलकों के अंदर की सतह पर एक पारदर्शी, पतली झिल्ली होती है जिसे कंजक्टिवा कहा जाता है। जब इस झिल्ली में सूजन आ जाती है या यह किसी संक्रमण की चपेट में आ जाती है तो इस स्थिति को कंजक्टिवाइटिस या आम भाषा में आंख आना कहा जाता है।
सूजन की वजह से कंजक्टिवा में मौजूद छोटी-छोटी रक्त नलिकाएं ज्यादा स्पष्ट दिखने लगती हैं, जिसके कारण आंखों का सफेद हिस्सा लाल या गुलाबी दिखाई देने लगता है; इसी वजह से इसे पिंक आई भी कहा जाता है। यह समस्या तीव्र (एक्यूट) रूप में अचानक और कम समय के लिए हो सकती है या लंबे समय तक बनी रहने पर क्रॉनिक कंजक्टिवाइटिस का रूप भी ले सकती है।
कंजक्टिवाइटिस कई अलग–अलग कारणों से हो सकता है, और हर कारण के साथ लक्षणों की प्रकृति तथा संक्रामकता भी बदल जाती है।
वायरल कंजक्टिवाइटिस के अधिकतर मामले एडेनोवायरस के कारण होते हैं, लेकिन हर्पीस सिम्प्लेक्स वायरस, वैरिसेला जोस्टर वायरस और कोरोना वायरस जैसे अन्य वायरस भी इसके लिए जिम्मेदार हो सकते हैं। आमतौर पर यह पहले एक आंख में शुरू होता है और कुछ दिनों में दूसरी आंख भी संक्रमित हो जाती है।
कुछ खास बैक्टीरिया आंखों की सतह पर संक्रमण पैदा कर देते हैं, जिससे बैक्टीरियल कंजक्टिवाइटिस होता है। यह भी वायरल की तरह संक्रामक है और संक्रमित व्यक्ति की आंखों से निकलने वाले पानी या गाढ़े डिस्चार्ज के सीधे या परोक्ष संपर्क से दूसरे लोगों तक पहुंच जाता है, जैसे एक ही तौलिया, रुमाल या तकिया साझा करने पर। यह एक या दोनों आंखों को प्रभावित कर सकता है और अक्सर चिपचिपा, पीला या हरा डिस्चार्ज इसकी पहचान बन जाता है।
जिन लोगों की आंखें किसी एलर्जन (जैसे परागकण, धूल, पालतू जानवरों के रोएं या प्रदूषण) के प्रति संवेदनशील होती हैं, उन्हें एलर्जिक कंजक्टिवाइटिस हो सकता है। इसमें शरीर की एलर्जिक प्रतिक्रिया के कारण कंजक्टिवा में सूजन, खुजली और पानी आना प्रमुख रूप से दिखाई देते हैं। यह आमतौर पर संक्रामक नहीं होता, लेकिन मौसम बदलने, खासकर वसंत या ठंडी हवा में, इसके केस अचानक बढ़ जाते हैं।
कभी-कभी कंजक्टिवाइटिस किसी रसायन या बाहरी चीज के संपर्क में आने से भी हो जाता है, जैसे स्विमिंग पूल के पानी में मौजूद क्लोरीन, धुआं, स्प्रे, या आंख में धूल-कण चले जाना। ऐसे मामलों में आंखों में अचानक जलन, लालपन और पानी आना शुरू हो जाता है, लेकिन अधिकतर बार यदि रसायन बहुत तीव्र न हो तो लक्षण एक-दो दिन में अपने आप ठीक हो जाते हैं।
नवजात शिशुओं में अक्सर अश्रु नलिका (टियर डक्ट) के पूरी तरह खुला न होने या जन्म के समय होने वाले संक्रमण के कारण कंजक्टिवाइटिस देखा जाता है। शिशुओं में यह स्थिति विशेष ध्यान मांगती है और माता-पिता को स्वयं दवा देने के बजाय तुरंत बाल रोग विशेषज्ञ या नेत्र विशेषज्ञ से मिलना चाहिए।
कुछ स्थितियां ऐसी होती हैं जहां आंख आना होने की संभावना काफी बढ़ जाती है।
कंजक्टिवाइटिस भले ही आंखों की सतह तक सीमित रहता है, लेकिन इसके लक्षण काफी परेशान करने वाले हो सकते हैं।
अधिकांश मामलों में कंजक्टिवाइटिस से दृष्टि पर स्थायी असर नहीं पड़ता, लेकिन यदि लक्षणों के साथ नजर धुंधली हो रही हो या प्रकाश से तेज तकलीफ हो रही हो तो यह गंभीर संकेत हो सकता है।
वायरल और बैक्टीरियल कंजक्टिवाइटिस दोनों ही अत्यधिक संक्रामक होते हैं, यानी एक व्यक्ति से दूसरे तक बहुत जल्दी पहुंच सकते हैं। संक्रमित आंखों से निकलने वाला डिस्चार्ज, पानी, या उससे लगे हुए तौलिए, तकिए, रूमाल, रूम साफ करने वाले टिश्यू आदि के संपर्क में आने से यह संक्रमण फैल जाता है।
कंजक्टिवाइटिस के फैलाव को रोकने के लिए स्वच्छता सबसे महत्वपूर्ण कदम है।
कुछ संकेतों को कभी नज़रअंदाज नहीं करना चाहिए, क्योंकि ये साधारण कंजक्टिवाइटिस से अधिक गंभीर समस्या की ओर इशारा कर सकते हैं।
ऐसे लक्षण दिखते ही स्वयं दवा लेने या किसी की आंख की दवा अपने ऊपर आजमाने के बजाय तुरंत नेत्र विशेषज्ञ से परामर्श करना चाहिए।
कंजक्टिवाइटिस के दौरान कुछ सरल उपाय लक्षणों में राहत दे सकते हैं, लेकिन इन्हें हमेशा डॉक्टर की सलाह के साथ जोड़कर ही अपनाना बेहतर होता है।
कंजक्टिवाइटिस यानी आंख आना दिखने में भले ही एक सामान्य और अक्सर खुद ठीक हो जाने वाली समस्या लगे, लेकिन इसे हल्के में लेना सही नहीं है। समय पर पहचान, सही कारण का पता लगाना, व्यक्तिगत स्वच्छता और डॉक्टर की सलाह से किया गया उपचार न सिर्फ आपके लिए राहत देता है, बल्कि आपके परिवार और आसपास के लोगों को भी संक्रमण से बचाता है। यदि लक्षण कुछ दिनों में कम न हों या दर्द, धुंधलापन और प्रकाश से तकलीफ जैसे गंभीर संकेत दिखाई दें, तो बिना देरी किए नेत्र विशेषज्ञ से मिलना सबसे सुरक्षित विकल्प है।
कंजक्टिवाइटिस का उपचार उसके कारण पर निर्भर करता है, इसलिए डॉक्टर पहले यह पहचानते हैं कि समस्या वायरल, बैक्टीरियल, एलर्जिक या रसायनिक है।
सायनों या धुएं के कारण आंख आने पर आंखों को तुरंत साफ पानी से धोना, जलन पैदा करने वाले पदार्थ से दूरी बनाना और आवश्यकता होने पर डॉक्टर से परामर्श लेना जरूरी है, जबकि किसी भी स्थिति में स्वयं स्टेरॉइड या दूसरों की आई ड्रॉप्स का प्रयोग करना खतरनाक साबित हो सकता है।
नहीं, सिर्फ वायरल और बैक्टीरियल कंजक्टिवाइटिस संक्रामक होते हैं; एलर्जिक और ज्यादातर रसायनिक कंजक्टिवाइटिस नहीं फैलते।
हल्के मामलों में साफ पानी, कोल्ड कंप्रेस और आराम से राहत मिल सकती है, लेकिन गाढ़ा डिस्चार्ज, दर्द, धुंधलापन या 2–3 दिन में सुधार न होने पर डॉक्टर से मिलना जरूरी है।
सीधे संक्रमण नहीं बढ़ता, लेकिन ज्यादा स्क्रीन टाइम से सूखापन और जलन बढ़ती है, इसलिए समय सीमित रखें और तेज ब्राइटनेस से बचें; दर्द या धुंधलापन हो तो स्क्रीन से ब्रेक लें।
कांटेक्ट लेंस तुरंत निकालकर इलाज पूरा होने तक न पहनें, और पुराने लेंस/केस बदलें; आई मेकअप कुछ समय के लिए बंद रखें और पुराना मस्कारा आदि डिस्कार्ड करना बेहतर है।
वायरल अक्सर 7–10 दिन में, बैक्टीरियल सही दवा से लगभग एक हफ्ते में ठीक हो जाता है; एलर्जिक तब तक रहता है जब तक एलर्जन के संपर्क में हैं, इसलिए ट्रिगर से बचना जरूरी है।
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